आरंभ के लिए
परम सत्य क्या है? क्या ईश्वर है?
वह प्रश्न जो हर परंपरा को बाँटता भी है और जोड़ता भी: क्या यथार्थ के मूल में कोई साकार ईश्वर है, कोई निराकार तत्त्व, कुछ ऐसा जिसे नाम नहीं दिया जा सकता — या प्रश्न ही ग़लत ढंग से पूछा गया है?
मैं कौन हूँ? क्या कोई सच्चा आत्म है?
अमर आत्मा, परम से अभिन्न आत्मन् और किसी स्थायी आत्म के अभाव — इन्हीं के बीच आध्यात्मिक इतिहास का बड़ा हिस्सा घटित होता है।
हम दुःख क्यों भोगते हैं?
अविद्या, तृष्णा, पाप, वियोग, विचार: हर गुरु ने पीड़ा की जड़ कहीं और देखी, और उपचार उसी निदान पर निर्भर करता है।
मृत्यु के बाद क्या होता है?
पुनरुत्थान, पुनर्जन्म, परम में विलय या जान-बूझकर मौन: उत्तर बताता है कि हर गुरु जीवन से क्या समझता है।
मुक्ति या उद्धार कैसे प्राप्त होता है?
कृपा, प्रयत्न, ज्ञान, भक्ति या बिना किसी विधि की समझ: हर एक का सुझाया मार्ग।
क्या गुरु आवश्यक है?
अनिवार्य गुरु से लेकर हर आध्यात्मिक सत्ता के निषेध तक: वह प्रश्न जो स्वयं गुरुओं को सबसे अधिक बेचैन करता है।